ओ गोली वाले ...बम वाले .../ अस्मिता
उनमे से कोई स्त्री
उसने पकाई थी तुअर की दाल और रोटी
शायद फिर कभी न बना पाए वो दाल
वो सोचेगी ये दाल मनहूस है
उसने पहनी होगी पीली धोती
सोचेगी पीला रंग मनहूस है
वह नही छोड़ने आई थी
पति को द्वार तक
उसने सोचा था रोज़ ही तो जाता है
उतनी देर में वह बच्चे का दूध गरम कर लेगी
उतनी देर में वह दुआ भी तो मांग सकती थी
उसने क्यों नही कहा इश्वर अंग संग रहना
उसने क्यों नही माँगा की वह गिर पड़ती
उसका हाथ पैर या बाजू टूट जाती
वह रह जाता घर पर ही उसकी सुश्रुषा के लिए
उसने क्यों कहा था घर जल्दी आना
शाम को घूमने चलेंगे
वह न कहती तो शायद वह अगली ट्रेन से आता
उसने क्यों न पहने मंगल के कुसुम बालो में
उसने क्यों नही फ़ोन उठाया उस दिन
क्यों वह रूठ गई छोटी सी बात पर
अभी लाश लेने जाना है
जाने कौन सा हाथ टूटा होगा
जिससे उसने पहली बार घूंघट खोला था
या फिर पैर जिससे उसने घूमे थे उसके साथ सात फेरे
साबुत होगा क्या उसका सर
जिसमे रहती थी सारी चिंताए प्यार और फ़िक्र
क्या पूरी होंगी वो आँखे
देख पाएगी अपनी छवि अंतिम बार उन आँखों में
ओ गोली वाले , बम वाले
तू सोचता है तेरी खुशियों में और उसके दुखो में विपरीत अनुपात है
तेरा उत्सव तो ख़त्म हो गया बस एक शाम उसकी शामे ही ख़त्म हो गई
तेरा एक अट्टहास एक मुस्कान एक उपलब्धि
और वह ....
आकर देख ना एक बार गोली वाले
बहुत से लोग मर गए
अनेक ज़ख़्मी हुए
जो घर में थे वो बुत में बदल गए ..
लीना मल्होत्रा की कविता
उनमे से कोई स्त्री
उसने पकाई थी तुअर की दाल और रोटी
शायद फिर कभी न बना पाए वो दाल
वो सोचेगी ये दाल मनहूस है
उसने पहनी होगी पीली धोती
सोचेगी पीला रंग मनहूस है
वह नही छोड़ने आई थी
पति को द्वार तक
उसने सोचा था रोज़ ही तो जाता है
उतनी देर में वह बच्चे का दूध गरम कर लेगी
उतनी देर में वह दुआ भी तो मांग सकती थी
उसने क्यों नही कहा इश्वर अंग संग रहना
उसने क्यों नही माँगा की वह गिर पड़ती
उसका हाथ पैर या बाजू टूट जाती
वह रह जाता घर पर ही उसकी सुश्रुषा के लिए
उसने क्यों कहा था घर जल्दी आना
शाम को घूमने चलेंगे
वह न कहती तो शायद वह अगली ट्रेन से आता
उसने क्यों न पहने मंगल के कुसुम बालो में
उसने क्यों नही फ़ोन उठाया उस दिन
क्यों वह रूठ गई छोटी सी बात पर
अभी लाश लेने जाना है
जाने कौन सा हाथ टूटा होगा
जिससे उसने पहली बार घूंघट खोला था
या फिर पैर जिससे उसने घूमे थे उसके साथ सात फेरे
साबुत होगा क्या उसका सर
जिसमे रहती थी सारी चिंताए प्यार और फ़िक्र
क्या पूरी होंगी वो आँखे
देख पाएगी अपनी छवि अंतिम बार उन आँखों में
ओ गोली वाले , बम वाले
तू सोचता है तेरी खुशियों में और उसके दुखो में विपरीत अनुपात है
तेरा उत्सव तो ख़त्म हो गया बस एक शाम उसकी शामे ही ख़त्म हो गई
तेरा एक अट्टहास एक मुस्कान एक उपलब्धि
और वह ....
आकर देख ना एक बार गोली वाले
बहुत से लोग मर गए
अनेक ज़ख़्मी हुए
जो घर में थे वो बुत में बदल गए ..
लीना मल्होत्रा की कविता
kuch shbd hi nahi bche kahne ko ,lgta hai rachna me sab kah diya gaya hai....
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